नाम को सार्थक करती पुलिस ?

धीरेन्द्र सिंह “राणा” (प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया जर्नालिस्ट)

पुलिस एक ऐसा शब्द है जिसका महत्व या उपयोगिता हमे तब समझ में आती है जब हम मुसीबत में होते हैं। क्या कभी हमने आपने सोचा है की खतरों से, दंगों से हम अपने आप को सुरक्षित महसूस करते हैं किसकी वजह से ? जी
हाँ वो पुलिस ही है जिसकी वजह से हम सुरक्षित रह पाते हैं। पुलिस के जवान अपनी जान की परवाह किए बिना हमारी हिफाजत के लिए समाज के ही बीच के लोगों से पत्थर खाते हैं, लाठी खाते हैं और तलवारों-भालों के निशाना बनते हैं। इतना सब होने के बावजूद भी पुलिस के जवान अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटते हैं।

चाहे कोई प्राकृतिक आपदा हो या आतंकवादी घटनाएं हो या अतिवादियों द्वारा दंगा-फसाद हो हम सब पुलिस की वजह से ही सुरक्षित रहते हैं। समाज की सुरक्षा के लिए पुलिसकर्मी अपनी जान तक पर खेल कर जाते हैं पर क्या कभी हम सब ने पुलिस की के बारे में सोचा है उनकी समस्याओं के बारे में समझने का प्रयास किया है। इतना सब होने के बावजूद पुलिस के पक्ष में आज कौन सुनना चाहेगा ? सच बात तो ये है कि आज समाज के हर एक वर्ग नेता, किसान, व्यापारी, वकील, पत्रकार आदि के अधिकतर लोगों ने पुलिस को टारगेट कर रखा है। लोगों के बीच पुलिस की छवि एक दबंग और डराने धमकाने वाले की है यहां तक कि लोगों ने पुलिस को क्या-क्या नहीं लिखा कुछ फिल्मों को छोड़ दिया जाए तो अधिकतर फिल्मों ने पुलिस की छवि को खराब करने में अहम भूमिका निभाई है। पुलिस की ऐसी छवि के कारण आज संतान के उत्पात से थकी हारी मां बच्चों को डराने के लिए अक्सर कहती सुनी जा सकती है कि बेटा शैतानी करोगे तो पुलिस आ जाएगी सरकारें पुलिस को मित्र पुलिस बनाने का प्रयास करती रही पर समाज में पुलिस की छवि का अंदाजा केवल इसी से लगाया जा सकता है कि आज भी माँ अपने अबोध बच्चों को डराने के लिए भूत, प्रेत, बाबा शब्द के साथ पुलिस शब्द का इस्तेमाल भी करती है। समाज में पुलिस की छवि ऐसी बन चुकी है कि लोगों के बीच पुलिस की बर्बरता के किस्से तो अक्सर चर्चित हो जाते हैं और काफी दिनों तक लोगों के मस्तिष्क में छाए भी रहते हैं पर पुलिस के द्वारा किए सामाजिक कार्यों को छापना भूल जाते हैं चिलचिलाती धूप हो या आधी रात का अंधेरा आंधी आ रही हो या लगी हो पानी की प्यास, भूख लगी हो या क्या पुलिस वीरान सुनसान पड़े शहरों की सड़कों व गलियों में दिन रात अराजकतत्वों से मोर्चा लिए रहती है चाहे सांप्रदायिक दंगे हो या कोई प्राकृतिक आपदा किसी की जान बचाना हो या कुख्यात अपराधियों से लड़ कर अपनी जान दांव पर लगाना हो। सबसे फ्रंट पर अगर कोई नजर आता है तो वह पुलिस का जवान ही है हर मोर्चे पर पुलिस आम जनता के लिए सुरक्षा कवच बनकर हमेशा सामने आती रही है। अभी हाल ही में कोविड-19 महामारी में पुलिस द्वारा ऐसे ऐसे सराहनीय कार्य कर मानवता को शर्मसार होने से बचाया गया पुलिस ने कोविड-19 के मरीजों को अस्पताल पहुंचाने से लेकर उनके परिजनों की देखभाल तक की और तो और कोविड के कारण दम तोड़ चुके ऐसे मरीजों को कंधा देकर उनका अंतिम संस्कार किया गया। विभाग आज भी अपने आप में सुधार की बाट जोह रहा है। समाज में सभी के मानवाधिकारों की सुरक्षा करने वाला ये विभाग आज अपने ही अधिकारों से वंचित सा लग रहा है । बिना छतरी के ट्रैफिक बूथ पर क्यूटी करता पुलिसकर्मी, सुरक्षा को सड़क किनारे बरसों से लगी गार्द के पुलिस कर्मियों के आवासीय टेन्ट, चिलचिलाती धूप में टीनशेड में रहना, महिला पुलिस कर्मियों के अपनी डयूटी के दौरान सर्दी-धूप-गर्मी बारिश में अपने नौनिहालों को गोद में लिए दिखना वर्दीधारी की पीड़ा बयां करने के लिए वास्तविकता का कुछ अंश ही हो सकता है। ना जाने अभी भी कितनी ऐसी समस्याएं होंगी जिन्हें खाकी विभाग के कर्मचारीगण अपने ही विभाग के अधिकारियों के सामने बताने तक से कातराते हैं। क्योंकि कहीं अनुशासनहीनता न मान ली जाए और उनके अधिकारियों की बेचारगी यह है कि वह अपने कर्मचारियों की समस्याओं से अवगत होकर और चाह कर भी कुछ खास समाधान नहीं कर पाते क्योंकि उनके हाथ में भी कुछ विशेष अधिकार नहीं होता है, क्योंकि अभी भी वह पुराने पुलिस एक्ट के रूल्स से बंधे हैं। आज स्वच्छ और स्वस्थ समाज के लिए पुलिस विभाग में जल्द से जल्द बहुत अधिक सुधार करने की आवश्यकता है जिससे पीड़ित खाकीधारी प्रहरियों की स्थिति में सुधार हो सके और वह सुधरी कार्यशैली से सामाज हितैषी कार्य कर समाज में अपना सम्मान पा सके, क्योंकि पुलिस के बिना अपराध मुक्त समाज की कल्पना करना नामुमकिन है।

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